(ध्यान से हमें क्या मिलता है। ध्यान कैसे काम करता है। ध्यान की शुरूआत में हमको सपने अधिक क्यों आते है।)
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ध्यान से हमें क्या मिलता है।
ध्यान कैसे काम करता है।
ध्यान व मानसिक शक्ति का वैज्ञानिक आधार।
ध्यान कैसे काम करता है।
ध्यान व मानसिक शक्ति का वैज्ञानिक आधार।
हमको हर समय ब्रहमाण्ड से आत्मशक्ति प्राप्त होती रहती है मगर हम उसको
पूरी तरह खर्च करते रहते है नष्ट करते रहते है। ध्यान से हमें कुछ नही
मिलता। ध्यान केवल हमारे विचारों को शान्त करने का माध्यम है। ध्यान
हमारे मन की आदत डालता है शान्त रहने की। शान्त रहने से हमको प्रापत होने
वाली एनर्जी बच जाती है। हमको प्राप्त होने वाली सारी एनर्जी हमारी
व्यर्थ के विचारों की वजह से अन्जाने में खर्चा होती रहती है। यदि हम इस
एनर्जी को बचा ले तो इसके माध्यम से अपनी व दूसरों की तमाम तरह की शारीरिक
मानसिक बीमारियों का समाधान करने के साथ अपने दैनिक जीवन में अधिक
सक्रियता हासिल कर सकते हैै और किसी भी क्षेत्र में सफलता की अनंत ऊचाईयों
पर पहुच सकते है। उस एनर्जी को बचाकर हम ऐसे कार्य कर सकते है जो कि दूसरों
को किसी चमत्कार से कम नही लगते मगर वो सब मानसिक शक्ति के बहुत छोटे से
कार्य है। हमारी मानसिक शक्ति से बडी शक्ति पूरे ब्रहमाण्ड में नही है।
मगर हम उसको अपने व्यर्थ के विचारों में खर्चा करते रहते है। इस शक्ति को
गलत व्यक्ति इसतेमाल ना कर पाये उसका इंतजाम प्रक्रति ने ही कर दिया है जब
तक हमारे में में गलत भावनायें विचार होंगे तब तक हम उस शक्ति को
इस्तेमाल नही कर सकते क्योकि तब हमारे मन में गलत विचार ही चलते रहेंगे
ओर वो कभी हमारी एनर्जी बचने नही देंगे। गंदे विचार अच्छे विचारों की
अपेक्षा सौ गुना अधिक एनर्जी नष्ट करते है।
यदि विचारों के पर्दे
के पीछे इस शक्ति को प्रक्रति ने छुपा कर ना रखा होता तो दुनिया में कितना
व्यभिचार अनाचार होता क्योकि शक्त्ि हाथ में आते ही नालायक आदमी सर्व
प्रथम उसका गलत इस्तेमाल ही करेगा जैसे किसी महिला को वश में करके उसका
गलत फायदा उठाना दूसरों के गुप्त रहस्यों को जानकार उसका उपहास करना उसका
नुकसान करना। किसी का धन हडपना आदि आदि।
अब लोगों का सवाल होता है
कि वो ध्यान में सफल क्यों नही हो रहे तो इसका कारण ये है कि वो ध्यान
करने बेठते है ध्यान में मन भी लग जाता है मगर उससे उठने के बाद वो अपने
मन को फिर से बेकार के कामों में चलाने लगते है। एक बार ध्यान में बैठने
से मन की आदत हो गयी थोडा शांत रहने की तो हमने उसको फिर से चला चला कर
पुरानी स्थिति में पहुचा दिया। दुबारा जब बैठे तो हम फिर से पुरानी स्थित
में पहुच चुके थे फिर से हमने अपने मन को शांत करने का प्रयास किया ओर फिर
से उठने के बाद वही गलती की। इस दशा में हमको कभी कोई अच्छी अध्यात्मिक
उपलब्धि नही हो सकती चाहे दस साल ध्यान करे या बीस साल। ध्यान में हमको
निरन्तर अपनी एकाग्रता को बढाते जाना है। सुबह ध्यान किया। मन शान्त
हुआ। अब उसको फालतू में चलाना नही है। फेसबुक की ओर नही भागना है। अखबार की
तरफ नही भागना है गाना पिक्चर की तरफ नही भागना है। केवल अपना काम करते
रहना है शांत रहते हुये। फिर शााम तक आपका मन शांत बना रहेगा और आप दुबारा
जब बैठेंगे तो उस अवस्था के और आगे अधिक गहराई में जायेंगे। फिर आपको अपने
मन को शांत रखना है। इस प्रकार हमको ध्यान की गहराई बढाते जाना है नही तो
बार बार बर्तन काे भरने वा खाली करने का चक्र चलता रहेगा ओर हमेशा खाली
हाथ ही रहोगे। रोज बैठोंगे निरन्तर बैठोंगे मगर एक बार के प्रयास को पूरे
दिन में बहाकर फिर से खाली हाथ होकर बैठ जाओगे फिर कमाओगे ओर उसको अगली बार
के ध्यान के समय तक फिर खर्चा करके खाली हाथ होकर बैठ जाओगे।
यदि
बार बार किसी चीज की तरफ मन भागता है तो समझो की बाहर की यात्रा चल रही है
यदि ध्यान का मन करता है तो अंदर की यात्रा चल रही है। सोचते हो कि अभी
करेंगेे तभी करेंगे दो घंण्टे बाद करेंगे खा कर करेंगे टी वी देख ले जरा
उसके बाद करेंगे तो आपके हाथ कभी जीवन में ध्यान के नाम पर कुछ नही आना।
और ये अंदर की नही बाहर की यात्रा है और आप ध्यान को जबरदस्ती बोझा बना
कर ढो रहे हो और ये आपको एनर्जी देने के बदले आपकी एनर्जी ले रहा है आप
बहुत जलदी निराशा में डूबने वाले हो। आपको यही लगेगा कि मै प्रयास कर रहा
हूॅ कुछ हाथ नही आ रहा। विधि में कोई कमी है। ध्यान की किसी विधि में कोई
कमी नही है आपमें कमी है आप अपनी कमियों पर नही देख रहे तो सफलता असम्भव
है।
अाप ये ना सोचो कि ध्यान करते करते किसी दिन एनर्जी आपके खाली
बर्तन में भर जायेगी ओर आप कुछ पा जाओगे। यदि उस बर्तन में विचार रूपी छेद
बन बिगड रहे है तो वो बर्तन सुबह शाम दो बार भरते रहो हमेशा खाली ही रहेगा
कोई चमत्कार नही होने वाला। ध्यान का सिर्फ यही काम है कि वो आपके मन को
शान्त करके आपको प्रापत होने वाली एनर्जी काे बचाता है। चमत्कार उसी
एनर्जी में छुपा है ना कि ध्यान में।
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ध्यान की शुरूआत में सपने अधिक क्यों दिखते है।।
ध्यान की शुरूआत में सपने अधिक क्यों दिखते है।।
हमारे मन में अक्सर ये सवाल उठता है कि ध्यान की शुरूआत करने पर सपने अधिक क्यों दिखते है।
सपने हम सबको सोते समय लगभग हर समय दिखते रहते है चाहे हम ध्यान करते हो
या नही। मगर साधारण अवसथा में जो लोग ध्यान नही करते वो बेहोशी की हालत
में सपने देखते है उनको जागने पर याद नही रहता कि सपना देखा। मगर ध्यानी
व्यक्ति की जागरूकता बढने पर उसको ये याद रहता है कि वो सपना देख रहा था
या उसने सपना देखा। इसमे कुछ भी गलत या समस्या नही है। हमारी भावनाअों के
अनुसार ही हमको सपने दिखते है।
सपनों के पीछे एक रहस्यमय दुनिया
है। हम जो करना चाहते है जाने में अंजाने में वो हम सपनों में पूरा कर लेते
है। सपना असल में सपना नही होता वो सच्ची घटनाये है जो कि हम निद्रा के
समय सूक्षम लोक में जाकर अंजाम देते है। हमको लगता है कि हमने रात मे किसी
दोस्त से मुलाकात की। उस दोस्त को कुछ नही मालूम होता। जबकि उसने
वास्तव में आपसे मुलाकात की होती है सूक्ष्म लोक में। मगर किसी को सपना
याद रह जाता है किसी को याद नही रहता। हमारे कई सूक्ष्म शरीर है जो कि
विभिन्न लोकों में हमारे स्तर के अनुसार रहते है। कोन सा शरीर कब क्या
काम कर रहा है हमको पता नही चलता कभी कभी याद रह जाता है। हमारे कई
सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म लोक आदि के विषय में आप केवल ध्यान की उच्च
अवस्था में जाकर ही देख पायेंगे। सोते समय हम जो सपने दिखते है उनसे किसी
तरह का कोई नुकसान नही है। ध्यान में आगे बढने पर वो सब सपने समाप्त हो
जाते है क्योकि हमारी इच्छाओ और विचारों की भाग दोड बंद हो जाती है। जब
तक हमारी इच्छाये चलती है सूक्ष्म लोकों में भी अन्जाने में हमारा काम
काज तब चलता है यदि आदमी के मन में कोई इच्छा या लालच ना हो तो वो काम
नही करेगा। यही कारण सूक्ष्म लोक में हमारे अन्य शरीरों के माध्यम से
चलने वाली क्रियाओं का है जो कि हमारी अधूरी इच्छाओं को दूसरे लोकों में
पूरा करते रहते है।
असली नुकसान हमारे उन सपनों से है जो कि हम
जागते मे देखते रहते है। जागते में सपने देखना क्या है। हम दिन भर जो
व्यर्थ के विचार करते है कभी दिल्ली कभी लंदन कभी फेसबुक कभी नीरज कभी
रमेश हीरो हीरोइन गाना पिक्चर मोदी राजीव के विषय में सोचते है। दिन के
समय जागते में देखे जाने वाले ये सब सपने एक प्रकार का पागलपन ही तो है और
अत्यंत खतरनाक है जो कि हमारी एनर्जी को नष्ट करते है। रात में सूक्ष्म
लोक में चलने वाली हमारी क्रियाये हमारी एनर्जी को नष्ट नही करती क्योंकि
तब विचारों की भागदौड समाप्त हो जाती है केवल क्रियाये ही चलती है।। इसी
वजह से हम सोते समय सपना सपने देखने पर भी भी सुबह अपने को तरोताजा महसूस
करते है। मगर यदि हम बहुत बेचैन है हमारा दिमाग जरूरत से जयादा उलझन व
परेशानी में है तो हम रात भर सो कर भी अपने मन को शांत नही कर पाते और वो
आपको प्रापत होने वाली ऊर्जा को खर्च करता रहता है तब आप सुबह उठने पर अपने
आप को तरोताजा महसूस नही कर पाते।
दिन भर जागते पर विचारों के चलते
हम अपने को थका या शक्तिहीन सा महसूस करते है और कुछ समय काम करने के बाद
फिर से शक्ति को प्रापत करने के लिये हमारे शरीर को नींद की आवश्यकता होती
हैे।
हमारे शरीर को दिन भर कार्य करने के लिये हमको ब्रहमाण्ड से
प्राप्त होने वाली आत्म शक्ति का केवल 5 प्रतिशत ही पर्याप्त है मगर
पूरे दिन व्यर्थ में चलने वाले विचार हमको प्रापत होने वाली आत्मशक्ति
का 95 प्रतिशत इस्तेमाल कर देते है नष्ट कर देते है। यदि हम केवल मतलब के
विचार करे ओर दिन भर शरीरिक श्रम करते रहे तो हम अपनी आत्मशक्ति का मात्र
दस बीस प्रतिशत ही खर्चा कर पायेंगे और 80 प्रतिशत एनर्जी को बचाने में
सफल हो जायेंगे। तब ईश्वर की बनाई दुनिया के रहस्यों को जान पायेंगे
अन्यथा नही।


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