त्राटक

अकसर देखने में आता है की खानपान के कमी और ज्यादा पढ़ने के कारण के कम उम्र में चश्मा लग जाता है या फिर वृद्धावस्था में धीरे धीरे नजर कमजोर होने लगती है.इसकी वजह युवावस्था में सबसे ज्यादा है. प्रकाश की उचित व्यवस्था न होना और लगातार पढ़ते रहना क्यों की हमारे आँखे अलग अलग दुरी पर अपने आप व्यवस्थित होती रहती है ऐसे में अगर लगातार आप कई देर तक पढ़ते है तब आँखे ज्यादा समय तक उसी अवस्था में रहती है और फिर उसे दुरी के हिसाब से समायोजित होने में वक़्त लगता है इस वजह से हमें कुछ देर तक साफ न देख पाना या फिर आँखों में अचानक पानी आने लगने जैसे समस्या होती है.पढाई में अंतराल और प्रकाश की व्यवस्था पर ध्यान देकर हम इस समस्या से बच सकते है.


ज्यादा वक़्त तक पढ़ने वाले और जिन्हे शुरुआती चश्मा लग गया है वो सुबह सुबह बगीचे में फिर हरे भरे वातावरण जैसे दुब वाले जगह पर आराम से बैठ कर अपने दाये हाथ के अंगूठे को (मुठी बंद और अंगूठा ऊपर की और सीधा तना हुआ) अपने आँखों की सीध में लए और उसे देखे इस तरह से जब हाथ में दर्द हो शांत होकर बैठे और फिर कुछ देर बाद फिर से अभ्यास करे ये अभ्यास शुरू में कुछ समय के लिए या 3 se 4 बार करे इसे करते हुए जब कुछ दिन बीत जाये तो आप अपने हाथ के अंगूठे को दाये बाये करे और उस अंगूठे के साथ आँखों की गति करे देखना सिर्फ अंगूठे को है अंगूठा जहा गति करे आँखे वही देखे. इस तरह का अभ्यास आँखों की मासपेशियों को मजबूत बनता है.
ये अभ्यास सुबह सूर्योदय के वक़्त या फिर शाम सूर्यास्त के वक़्त करना चाहिए.
1.इस अभ्यास से आँखों में पानी आने की समस्या दूर हो जाती है.
2.शुरुआती चढ़े हुए चश्मे को इस अभ्यास द्वारा कुछ ही दिनों में दूर कर सकते है.
3.जिन सज्जन को वक़्त के साथ साथ नम्बर बढ़ने की समस्या है.वो इसे और बढ़ने से रोक सकते है और वक़्त के साथ कम भी कर सकते है.
4.ये अभ्यास आँखों के लिए फायदेमंद है जिनको कंप्यूटर और पढाई में लम्बे समय तक रहना पड़ता है वो इस अभ्यास द्वारा नजर बरक़रार रख सकते है.
विद्यार्थी जीवन :

विद्यार्थी जीवन में सबसे ज्यादा जरुरी है तंदुरस्त दिमाग और चुस्त शरीर. इस में हमारा जीवन एक कसौटी की तरह होता है कई चरण पर करते हुए हम अपनी मंजिल की और अग्रसर होते रहते है. यहाँ पर ज्यादा पढ़ना जरुरी नहीं होता है महत्त्व इस बात का है की जो हमने पढ़ा है उसका कितना हमें उसी वक़्त याद हो गया है. कुछ बातो को ध्यान में रखते हुए अगर हम अध्यन करते है तो हम कम समय में ज्यादा हासिल करते है.
आलस्य का त्याग :- शरीर को ज्यादा से ज्यादा आराम देना सबको अच्छा लगता है. पर अगर हम आलस्य को त्याग कर सुबह जल्दी उठते है और सूरज उदय होने से पहले नियमित क्रिया कलाप से निपट लेते है तो हम ज्यादा ऊर्जावान और स्वस्थ महसूस करते है.और सभी कम रुचिपूर्ण ढंग से करते है.
प्राणायाम और त्राटक & ध्यान :-


शरीर में प्राण वायु की शुद्धता की कमी आलस्य का सबसे बड़ा कारण होती है. इससे बचने के लिए हमें प्राणायाम और त्राटक & ध्यान करना चाहिए प्राणायाम से साफ प्राण शरीर में प्रवाह करता है और त्राटक से हमारी आँखे साफ और नजर तेज रहती है. वाही ध्यान से मन का भटकाव रुकता है और हमारे आत्मशक्ति में वृद्धि होती है.इससे हमारे सोचने और समझने में सकारात्मक परिवर्तन आता है.
मन के शांत रहने से पड़ने वाले प्रभाव :_
मन जब शांत रहता है तब अपने सामने होने वाले कार्य को ज्यादा महत्त्व देता है. उस वक़्त अगर हम पढ़ते है तब हम उसे अच्छे से समझ पाते है. और जब हम एक निश्चित बिंदु तक पढ़ ले तब हमें थोड़ीदेर टहल लेना चाहिए इससे प्राण वायु का प्रवाह सामान्य बना रहता है और आलस्य नहीं आता है.टहलने के दौरान अगर हमारा मष्तिष्क अगर उस पहले पढ़े हुए के बारे में सोचे और हमारे सामने पढ़ा हुआ घूमने लगे और हम बगैर किताब के भी उन्हें ऐसे दोहराये जैसे की सामने किताब खोल के बैठे है तब मन ले की आपका मष्तिष्क पूरी तरह शांत है और आप कही भी उस बिंदु को दोहरा सकते है ये बिलकुल ऐसा है जैसे आप पढ़ रहे हो.
ये सब ध्यान और त्राटक से संभव है. और हर उम्र का इंसान (8 ) से ऊपर का ध्यान और त्राटक कर सकते है.
विद्यार्थी त्राटक करना चाहे तो वो बिंदु पर त्राटक करे ये काफी है मन को नियंत्रित करने के लिए.
इसके आलावा एक नियमित दिनचर्या का पालन कर हम सकारात्मक तरीके से अध्ययन में तरक्की pa सकते है

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